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डॉ. अरविंदर सिंह ने उठाया सवाल: डिजिटल बैंकिंग के दौर में दिव्यांगजन अब भी बैंक की सीढ़ियों पर क्यों अटके?


150 से अधिक आरटीआई के बाद खुली हकीकत, कागजों में सुगम हैं बैंक, जमीन पर नहीं

उदयपुर । देश में डिजिटल बैंकिंग, आधुनिक वित्तीय सेवाओं और ग्राहक सुविधा के बड़े-बड़े दावों के बीच दिव्यांगजनों के लिए बैंकिंग सेवाओं की वास्तविक स्थिति आज भी चिंताजनक बनी हुई है। देश के प्रमुख बैंक—केनरा बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, पंजाब नेशनल बैंक, एचडीएफसी बैंक तथा अन्य बैंकिंग संस्थान—कई स्थानों पर अब भी दिव्यांगजनों के लिए आवश्यक सुगम्यता मानकों का पूर्ण पालन नहीं कर रहे हैं। इससे लाखों दिव्यांग नागरिकों को बैंकिंग जैसी आवश्यक सेवा तक समान, सुरक्षित, स्वतंत्र और सम्मानजनक पहुंच प्राप्त करने में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
उदयपुर शहर का मधुबन क्षेत्र, जो प्रमुख बैंकिंग केंद्रों में गिना जाता है, वहां भी कई बैंक शाखाओं में रैम्प, व्हीलचेयर-अनुकूल प्रवेश, सुगम लॉकर, टॉकिंग एटीएम, ब्रेल कीपैड, स्क्रीन रीडर-अनुकूल डिजिटल सेवाएं और प्रशिक्षित कर्मचारियों जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव सामने आया है। यह स्थिति केवल सुविधा की कमी नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों के संवैधानिक अधिकार, गरिमा और समान अवसर के अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

अर्थ डायग्नोस्टिक्स के सीईओ और पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स के अध्यक्ष डॉ. अरविंदर सिंह ने कहा कि दिव्यांगजनों के लिए बैंकिंग सेवा कोई विशेष कृपा या अतिरिक्त सुविधा नहीं है, बल्कि यह उनका कानूनी और संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक के स्पष्ट दिशा-निर्देश, दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों के बावजूद बैंकों द्वारा सुगम्यता मानकों की अनदेखी अत्यंत गंभीर विषय है। इसका मुख्य कारण उल्लंघन के बावजूद कोई कार्यवाही का न

डॉ. सिंह ने कहा, “जब देश डिजिटल भारत, वित्तीय समावेशन और समान अवसर की बात करता है, तब किसी दिव्यांग नागरिक को बैंक के दरवाजे, एटीएम, लॉकर या केवाईसी प्रक्रिया में ही रोक दिया जाना स्वीकार्य नहीं हो सकता। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों के सम्मान, स्वतंत्रता और समानता के अधिकार का उल्लंघन है। ऐसे बैंकों पर निरीक्षण, जवाबदेही और दंडात्मक कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए।”

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत भी यह स्पष्ट कानूनी दायित्व है। अधिनियम की धारा 3 दिव्यांग व्यक्ति को समानता, गरिमा, स्वतंत्रता और भेदभाव रहित जीवन का अधिकार देती है। धारा 40 सरकार को भौतिक वातावरण, परिवहन, सूचना, संचार तथा जन-सेवाओं के लिए सुगम्यता मानक बनाने का अधिकार देती है। धारा 44 कहती है कि किसी भी भवन या सेवा को निर्धारित सुगम्यता मानकों की अवहेलना कर संचालित नहीं किया जा सकता। धारा 45 और 46 मौजूदा भवनों तथा सेवा प्रदाताओं को निर्धारित समय सीमा में दिव्यांगजनों के लिए सुगम बनाने की जिम्मेदारी तय करती हैं। धारा 89 के अनुसार अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है, जिसमें पहली बार उल्लंघन पर आर्थिक दंड और दोहराए गए उल्लंघन पर अधिक कठोर दंड लगाया जा सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक ने समय-समय पर बैंकों को दिव्यांगजनों के लिए समान बैंकिंग सुविधा उपलब्ध कराने के स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं। 4 जून 2008, 13 अप्रैल 2009, 5 सितंबर 2012, 21 मई 2014 और 9 नवंबर 2017 को जारी दिशा-निर्देशों में बैंकों को कहा गया था कि दृष्टिबाधित, चलने-फिरने में असमर्थ, श्रवणबाधित तथा अन्य दिव्यांग ग्राहकों को चेकबुक, एटीएम, लॉकर, नेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग, ऋण, क्रेडिट कार्ड और अन्य सभी बैंकिंग सेवाएं बिना भेदभाव उपलब्ध कराई जाएं। इन निर्देशों में यह भी स्पष्ट किया गया था कि बैंक शाखाओं और एटीएम को रैम्प, ब्रेल कीपैड, टॉकिंग एटीएम, व्हीलचेयर-अनुकूल प्रवेश और सहायता प्रणाली से लैस किया जाना चाहिए।

वर्ष 2024 में वित्त मंत्रालय द्वारा जारी बैंकिंग क्षेत्र के सुगम्यता मानकों ने इस जिम्मेदारी को और स्पष्ट कर दिया है। इन मानकों में बैंक परिसर, एटीएम, स्व-सेवा मशीनें, मोबाइल ऐप, वेबसाइट, डिजिटल भुगतान प्रणाली, ग्राहक सेवा, केवाईसी प्रक्रिया और शिकायत निवारण व्यवस्था को दिव्यांग-अनुकूल बनाने पर विशेष बल दिया गया है। इसका अर्थ यह है कि अब बैंक केवल शाखा के बाहर बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर सकते, बल्कि उन्हें भवन, सेवा, तकनीक और कर्मचारी-व्यवहार—चारों स्तरों पर वास्तविक सुगम्यता सुनिश्चित करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने भी दिव्यांग अधिकारों को केवल कल्याणकारी विषय नहीं, बल्कि मौलिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा माना है। जीजा घोष बनाम भारत संघ में न्यायालय ने कहा था कि दिव्यांग व्यक्ति की गरिमा, सम्मान और समान व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से जुड़े अधिकार हैं। विकास कुमार बनाम संघ लोक सेवा आयोग में सुप्रीम कोर्ट ने “उचित सुविधा” को वास्तविक समानता का अनिवार्य हिस्सा माना और स्पष्ट किया कि दिव्यांगता को व्यक्ति की कमी नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था में मौजूद बाधाओं के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। इसी प्रकार राजीव रतूड़ी बनाम भारत संघ मामले में न्यायालय ने सार्वजनिक स्थानों, परिवहन और सेवाओं में सुगम्यता को दिव्यांगजनों के स्वतंत्र आवागमन और सम्मानजनक जीवन से जोड़ा।

हाल ही में डिजिटल सुगम्यता को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशा दिखाई है। डिजिटल केवाईसी, वीडियो केवाईसी, आंख झपकाने की शर्त, चेहरे की पहचान, हस्ताक्षर सत्यापन और स्क्रीन रीडर-अनुकूलता जैसी समस्याओं के कारण दृष्टिबाधित व्यक्तियों तथा चेहरे या आंखों से संबंधित विकृति वाले व्यक्तियों को बैंकिंग और अन्य आवश्यक सेवाओं से वंचित होना पड़ रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए डिजिटल पहुंच को जीवन और गरिमा के अधिकार से जोड़ा और वित्तीय संस्थानों को ऐसी व्यवस्था बनाने की दिशा में निर्देश दिए, जिसमें वैकल्पिक सत्यापन, अंगूठा निशान, सहायक तकनीक, ऑफलाइन विकल्प और स्क्रीन रीडर-अनुकूल प्लेटफॉर्म उपलब्ध हों।

इसी पृष्ठभूमि में एचडीएफसी बैंक, मधुबन शाखा, उदयपुर को पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स की ओर से औपचारिक पत्र भेजा गया था। पत्र में संस्था के अध्यक्ष डॉ. अरविंदर सिंह, जो उसी शाखा के प्रीमियम ग्राहक हैं और सुगम लॉकर और बाधारहित बैंकिंग सेवा उपलब्ध कराने की मांग की गई थी। डॉ. सिंह की शारीरिक स्थिति ऐसी है कि वे सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते और चलने के लिए कैलिपर तथा सहायक उपकरणों का उपयोग करते हैं। इसके बावजूद बैंक की लॉकर सुविधा ऐसी जगह स्थित है, जहां पहुंचने के लिए सीढ़ियों का उपयोग अनिवार्य है।

बैंक द्वारा दिए गए जवाब में रैम्प या वैकल्पिक सुगम व्यवस्था उपलब्ध कराने में असमर्थता जताते हुए “भवन संबंधी समस्या” का हवाला दिया गया और डॉ. सिंह को दूसरी शाखा में लॉकर सुविधा लेने की सलाह दी गई। पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने इसे दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, आरबीआई दिशा-निर्देश और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सुगम्यता सिद्धांतों के विपरीत बताया है। संस्था का कहना है कि किसी दिव्यांग ग्राहक को यह कहना कि वह अपनी सुविधा के लिए दूसरी शाखा चला जाए, समान सेवा नहीं बल्कि भेदभावपूर्ण व्यवहार है। बैंक को ग्राहक को स्थानांतरित करने के बजाय अपनी शाखा को सुगम बनाना चाहिए।

अभी हाल ही में भारतीय स्टेट बैंक ने आर टी आई के जवाब में उदयपुर में अपनी शाखाओं तथा ए टी एम का सुगम्य होना बताया था पर वास्तिवकता में बहुत से शाखाएं सिर्फ सीढिया तथा फर्स्ट फ्लोर पर बिना लिफ्ट के भी पायी गयी।

डॉ. सिंह ने कहा कि यदि बैंक लॉकर, खाता, एटीएम, डिजिटल केवाईसी या ग्राहक सेवा तक दिव्यांग नागरिक को स्वतंत्र पहुंच नहीं दे सकता, तो यह बैंकिंग सेवा की मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने कहा कि “भवन संबंधी समस्या” दिव्यांग अधिकारों से बचने का बहाना नहीं बन सकती। यदि बैंक किसी सामान्य ग्राहक को लॉकर, ऋण, खाता या डिजिटल सेवा प्रदान करता है, तो वही सेवा दिव्यांग ग्राहक को भी समान गरिमा के साथ मिलनी चाहिए।

पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने बताया कि संस्था अब तक विभिन्न विभागों और बैंकिंग संस्थानों में 150 से अधिक सूचना के अधिकार आवेदन दायर कर चुकी है। इन आवेदनों का उद्देश्य यह जानना है कि बैंकों में रैम्प, सुगम लॉकर, टॉकिंग एटीएम, ब्रेल संकेतक, दिव्यांग-अनुकूल शौचालय, स्क्रीन रीडर-अनुकूल वेबसाइट, मोबाइल ऐप, प्रशिक्षित कर्मचारी और शिकायत निवारण प्रणाली वास्तव में उपलब्ध हैं या केवल कागजों में दिखाई जा रही हैं।

संस्था ने मांग की है कि भारतीय रिजर्व बैंक, बैंकिंग लोकपाल, मुख्य आयुक्त दिव्यांगजन अधिकार, राज्य आयुक्त दिव्यांगजन अधिकार तथा संबंधित न्यायिक मंच ऐसे बैंकों की जवाबदेही तय करें। जिन शाखाओं में रैम्प, सुगम लॉकर, टॉकिंग एटीएम, डिजिटल सुगम्यता और प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं, उनके विरुद्ध निरीक्षण, समयबद्ध सुधार आदेश, आर्थिक दंड और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक कार्रवाई की जानी चाहिए।

संस्था ने यह भी कहा कि प्रत्येक बैंक को अपनी शाखाओं की सुगम्यता जांच कर सार्वजनिक रिपोर्ट जारी करनी चाहिए। प्रत्येक शाखा में दिव्यांग सहायता अधिकारी नामित किया जाना चाहिए। लॉकर क्षेत्र, नकद काउंटर, ग्राहक सेवा डेस्क, पासबुक प्रिंटिंग मशीन, एटीएम और शिकायत कक्ष तक बाधारहित पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। वेबसाइट और मोबाइल ऐप को स्क्रीन रीडर, आवाज आधारित मार्गदर्शन, बड़े अक्षर, उच्च रंग-विपरीतता और सरल भाषा के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।

डॉ. अरविंदर सिंह ने कहा कि भारत में दिव्यांगजनों के अधिकारों की सबसे बड़ी समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि कानून के क्रियान्वयन की कमी है। उन्होंने कहा कि जब तक नियमों के उल्लंघन पर दंड नहीं लगेगा, निरीक्षण सार्वजनिक नहीं होंगे और शाखा स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक दिव्यांगजनों को वास्तविक समानता नहीं मिल पाएगी।

पेनेशिया डिसेबिलिटी राइट्स एक्टिविस्ट्स ने स्पष्ट किया कि बैंकिंग सेवा कोई विलासिता नहीं, बल्कि नागरिक जीवन की मूल आवश्यकता है। पेंशन, वेतन, ऋण, बीमा, सरकारी सहायता, डिजिटल भुगतान, बचत, लॉकर और निवेश—इन सभी सेवाओं से दिव्यांगजन को वंचित करना उसके आर्थिक स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करता है।

संस्था ने अंत में कहा कि दिव्यांगजन दया नहीं, अधिकार चाहते हैं। बैंकिंग क्षेत्र को अब यह समझना होगा कि सुगम्यता खर्च नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। जिस दिन बैंक का दरवाजा, एटीएम, लॉकर और डिजिटल मंच दिव्यांग नागरिक के लिए समान रूप से खुलेंगे, उसी दिन वित्तीय समावेशन का दावा वास्तविक अर्थों में सफल माना जाएगा।


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