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संयुक्त परिवार टूट गए, एकल परिवार बढ़ गए : आचार्य पुलक सागर महाराज


उदयपुर 21 जुलाई। सर्वऋतु विलास स्थित महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में राष्ट्रसंत आचार्यश्री पुलक सागर महाराज ससंघ का चातुर्मास भव्यता के साथ संपादित हो रहा है। किसी क्रम में सोमवार को टाउन हॉल नगर निगम प्रांगण में 27 दिवसीय ज्ञान गंगा महोत्सव के दूसरे विविध प्रसंग पर प्रवचन हुए। चातुर्मास समिति के अध्यक्ष विनोद फान्दोत ने बताया कि कार्यक्रम में राजसमंद विधायक दीप्ति किरण माहेश्वरी, पुलिस अधीक्षक योगेश गोयल, शहर विधायक ताराचंद जैन, ओसवाल बड़े साजन सभा के अध्यक्ष कुलदीप नाहर, डॉ. उमा शंकर शर्मा, प्रशांत देवशाले वापी, सुरेश कोठारी, विवेक वशिष्ठ, पूर्व पार्षद रेखा उंटवाल सहित कई अतिथि मौजूद थे । सर्वऋतु विलास के बाल-गोपाल मंडल के बच्चों ने मंगलाचरण की प्रस्तुति दी।


ज्ञान गंगा महोत्सव के दूसरे दिन आचार्य पुलक सागर महाराज ने कहां कि परिवार छोटा करने से जीवन में शांति नहीं आती है, परिवार हमेशा संयुक्त होना चाहिए । लड़ना आदमी का स्वभाव है, भले ही बाजार में समान मिल जाता है, लेकिन  शांति नहीं मिलती है । संतों के सत्संग से शांति मिला करती है । एक बच्चा आया, बोला मम्मी इतना पीटती क्यों है, मैने कहा मम्मी बदल ले, और अगर मम्मी नहीं बदल सकता तो अपनी आदत बदल ले, पहले की मम्मियां कपड़े हाथ से धोती थी, गुस्सा वहां निकल जाता था, आजकल की मम्मियां वॉशिंग मशीन में कपड़े धोती है तो गुस्सा तो बच्चों पर ही निकलेगा । संयुक्त परिवार टूट रहा है । लेट शादी होती है । एक दूसरे को बर्दाश्त नहीं करते और साल दो साल में तलाक की नौबत आ जाती है । इस तलाक के बढ़ते हुए ग्राफ को रोकना होगा, वरना इस देश को अमेरिका बनने में कोई समय नहीं लगेगा । वहां जूते चप्पल की तरह पति पत्नी बदलते है। झगड़े तो कौरव पांडवों के घर में भी थे, हर जगह होंगे लेकिन उन्हें संभालने वाला कोई ना कोई होना चाहिए । अकेले व्रत और उपवास करना तपस्या नहीं है, किसी की दो बात सहन करना सबसे बड़ी तपस्या है । बोलो कम सुनो ज्यादा । एक क्षण का गुस्सा 24 घंटे का जीवन खराब कर देता है । इंसान फालतू की बातों का गुस्सा करता है । पुरानी बातों को याद करके या भविष्य को लेकर किसी बातों पर इंसान गुस्सा कर रहा है । ना भूत के लिए जियो ना भविष्य के लिए, मेरे महावीर कहते है जो वर्तमान के लिए जीता है, वो वर्धमान हो जाया करता है ।

ज्ञान गंगा महोत्सव में उपस्थित अतिथिगण


आचार्य ने कहा कि 90 प्रतिशत बातें ऐसी है लड़ने की, जिनका कोई औचित्य नहीं है । घर में लड़ाई हो रही पति पत्नी के बीच में, पति बोला मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा और पत्नी बोली मेरा बेटा वकील बनेगा, मैंने पूछा बच्चे से भी पूछ लो कि वो क्या बनेगा । तो पत्नी बोली बच्चा तो पैदा ही नहीं हुआ । भविष्य को लेकर अभी से घर में झगड़े हो रहे है । आवेश में आदमी कुछ भी बोलता रहता है । जितना गुस्सा तुम करोगे उतना जीवन जहरीला हो जाएगा, बीमारियां हो जाएगी, हॉस्पिटल चले जाओगे । ज्यादा क्रोध करोगे तो ब्रेन हेमरेज हो जाएगा । ज्यादा मायाचारी करोगे तो लकवा हो जाएगा और ज्यादा अकड़ कर जियोगे तो हार्ट अटैक हो जाएगा । ज्यादा लोभ करोगे तो कोमा में चले जाओगे । पति पत्नी से कहे कि कभी मै आग बनू तो तू पानी बन जाना और कभी तू आग बने तो मैं पानी बन जाऊं, शादी के समय ये वचन लेना शुरू कर दो, मकानों में ही अग्निशामक यंत्र नहीं दिमाग में भी अग्निशामक यंत्र लगाना जरूरी है । क्रोध जीवन को बर्बाद करता है, दिल गरम गरम नहीं दिल नरम नरम रखना चाहिए। सोमवार को सप्ताह का पहला दिन है, इसलिए क्रोध नहीं करना, मंगलवार को क्रोध आए तो सब मंगल हो, बुधवार को क्रोध आए तो बोलना बुद्ध को करो शुद्ध, गुरूवार को क्रोध आए तो बोलना गुरुवार गुरु का दिन, शुक्रवार को क्रोध आए तो कहना शुक्रिया और शनिवार को क्रोध आए तो कहना, हे शनिचर मेरे घर में प्रवेश नहीं कर और रविवार तो वैसे भी छुट्टी का वार होता है।


चातुर्मास समिति के महामंत्री प्रकाश सिंघवी व प्रचार संयोजक विप्लव कुमार जैन ने बताया कि श्रद्धालुओं ने यह अनुभव किया कि यह महोत्सव केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आत्मिक रूप से परिवर्तनकारी था। उदयपुर वासियों के लिए यह आयोजन आध्यात्मिक नवचेतना का एक दुर्लभ अवसर बना, जिसमें गुरु और शिष्य के पवित्र रिश्ते को गहराई से समझने और अपनाने का मार्ग मिला। कार्यक्रम में चातुर्मास समिति के पदाधिकारियों, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, समाजसेवियों व बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही। समिति ने समर्पण भाव से सभी व्यवस्थाएँ संभालीं, जिससे आयोजन सफल व प्रभावशाली बन रहा है । इस अवसर पर शांतिलाल भोजन, आदिश खोडनिया, पारस सिंघवी, शांतिलाल मानोत, नीलकमल अजमेरा सहित उदयपुर, डूंगरपुर, सागवाड़ा, साबला, बांसवाड़ा, धरियावद, भीण्डर, कानोड़, सहित कई जगहों से हजारों श्रावक-श्राविकाएं मौजूद रहे।


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